बिहार में बेरोज़गारी और खेती की दयनीय स्थिति लंबे समय से जटिल समस्याएं हैं। अगर युवा दिशाहीन होते हैं तो अपराध की तरफ खिंचाव बढ़ता है। लेकिन यह पूरी तरह किसानों या ग्रामीण युवाओं को हत्यारा ठहराना न्यायोचित नहीं।
जवाबदेही उस तंत्र की है जो शिक्षा, रोज़गार और क़ानून-व्यवस्था उपलब्ध कराने में विफल रहा है। पुलिस तंत्र भी राजनीतिक हस्तक्षेप और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है।
“हत्याओं से ज़्यादा चिंता या फिर नेताओं के बयान में है ज़ख्म कुरेदने वाला नमक-अचार?”
जब जनप्रतिनिधि संवेदनशील मुद्दों पर सस्ती बयानबाज़ी करते हैं, तो वह जनता के ज़ख्मों पर मरहम नहीं, नमक छिड़कने जैसा होता है।
यह लोकतांत्रिक विमर्श की गिरावट है, जहाँ समाधान से ज़्यादा जोर प्रचार पर है।
“ये जंगलराज नहीं तो फिर बंदूकराज?”
अगर आम नागरिक भय में जी रहा हो, पुलिस निष्क्रिय हो और अपराधी बेखौफ — तो इसे कानून का राज नहीं कहा जा सकता।
“जंगलराज” कहें या “बंदूकराज”, सवाल यह है कि क्या सरकार व्यवस्था लागू करने में सक्षम है या नहीं।
बिहार में हाल की घटनाएँ चिंताजनक हैं। दोषारोपण से आगे बढ़कर ज़रूरत है:
- पुलिस सुधारों की
- न्यायिक जवाबदेही की
- युवा नीति, रोज़गार, और शिक्षा पर ठोस कार्यवाही की
- और सबसे बढ़कर, ज़िम्मेदार राजनीतिक नेतृत्व की
बिहार को बहस नहीं, बदलाव चाहिए।
नेताओं को बयान नहीं, भरोसा देना होगा।
जनता को डर नहीं, लोकतंत्र चाहिए।



