उत्तर प्रदेश और केंद्र की बीजेपी सरकारों ने इस वर्ष मुहर्रम के जुलूस की अनुमति दे दी है। यह वही आयोजन है जिसे पूर्ववर्ती कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सरकारों ने कई बार रोका था।

इस निर्णय के बाद राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं — क्या यह धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान है या फिर कुछ वर्गों को खुश करने की राजनीति?
बीजेपी लंबे समय से “वोटबैंक पॉलिटिक्स” की आलोचक रही है, लेकिन अब उसी पर तुष्टिकरण का आरोप लग रहा है। क्या एकतरफा नरमी से धार्मिक कट्टरता को बल नहीं मिलेगा?

सोचने की बात है — क्या यह निर्णय संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के अंतर्गत आता है या फिर यह एक नया appeasement model है?







