जगदलपुर:छत्तीसगढ़ में अफसरशाही इस कदर हावी और बेलगाम है कि अफसरों ने आदिवासी संस्कृति और राज्य की समृद्ध परंपराओं को चूर-चूर कर दिया है। एक ओर भ्रष्टाचार में लिप्त अफसर कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अपने प्रशासनिक दायित्वों और काम को ठीक से अंजाम दे भी नहीं पा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर ऐसी कौन सी रस्म और कौन सा रिवाज है, जिसके तहत महामहिम राष्ट्रपति के सामने ही बस्तर दशहरा की गलत और भ्रामक तस्वीरें पेश कर दी गईं?
विश्व प्रसिद्ध 600 साल पुरानी बस्तर दशहरा परंपरा में इस बार प्रशासनिक दखलअंदाजी, कुप्रबंधन और परंपराओं से कथित खिलवाड़ को लेकर बस्तर का मूल समाज आक्रोशित हो उठा है। प्रशासन की मनमानी के खिलाफ 84 परगना के मांझी-चालकी और सर्व आदिवासी मूलनिवासी समाज ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।
महापंचायत में 15 सूत्रीय प्रस्ताव पारित, उग्र आंदोलन की चेतावनी
रविवार को संभागीय ध्रुवा समाज भवन तेजसूंटी में सर्व आदिवासी मूलनिवासी समाज की एक आपात महापंचायत आयोजित की गई। इस बैठक में 84 परगना के मांझी-मुखिया और सामाजिक प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से 15 सूत्रीय प्रस्ताव पारित किए।

बैठक में समाज प्रमुखों ने स्पष्ट कहा कि अफसरों ने न केवल बस्तर की सदियों पुरानी परंपराएं तोड़ीं, बल्कि राशन बांटने जैसी व्यवस्थाओं के लिए देवी-देवताओं और आंगा देवों तक को कतार में खड़ा कर दिया। समाज ने चेतावनी दी है कि बस्तर दशहरा समिति और मां दंतेश्वरी टेंपल कमेटी से अफसरों का दखल तुरंत खत्म किया जाए और इसकी कमान पारंपरिक मांझी-चालकियों व मूलनिवासी समाज को सौंपी जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो पूरे संभाग स्तर पर उग्र आंदोलन किया जाएगा।
राष्ट्रपति के सामने AI पेंटिंग्स की प्रदर्शनी
हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के जगदलपुर प्रवास के दौरान प्रशासनिक लापरवाही का बड़ा मामला सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार, राष्ट्रपति को बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक रस्में दिखाने के लिए लालबाग में आनन-फानन में एआई (AI) पेंटिंग्स की प्रदर्शनी सजाई गई थी। इन तस्वीरों में ऐसी आकृतियां और रस्में दिखाई गईं, जिनका बस्तर की वास्तविक परंपराओं से दूर-दूर तक कोई मेल नहीं था।

काछन देवी का गलत चित्रण व छलावा
सर्व आदिवासी समाज की महिला अध्यक्ष रुक्मणी कर्मा और समाज प्रमुखों का आरोप है कि काछनगादी की मुख्य रस्म निभाने वाली मूल बालिका (पौहुदास) से राष्ट्रपति को नहीं मिलवाया गया। उनकी जगह किसी अन्य बालिका को पेश किया गया, जिसे समाज ने परंपरा और राष्ट्रपति दोनों के साथ छलावा बताया है। इसके अलावा पेंटिंग में काछन देवी को झूलते हुए दिखाया गया, जबकि वास्तव में वे कांटों पर लेटती हैं।
रथ और रस्मों की गलत जानकारी
बस्तर दशहरा का रथ 2 मंजिला आयताकार होता है, न कि मंदिरनुमा जैसा कि तस्वीरों में दिखाया गया। दंतेवाड़ा से माता डोली पर बैठकर नहीं आतीं, बल्कि वहां से माता की डोली और छत्र आते हैं। बेल जात्रा के दौरान थाल पर बेल सजाकर नहीं दिखाए जाते, बल्कि राजा स्वयं बेल को अपने हाथ में लेकर आते हैं। परिक्रमा को युद्ध जैसा दर्शाया गया, जो पूरी तरह गलत है।
इसके अतिरिक्त, 9 दिनों तक साधना में बैठने वाले जोगी को समय से पहले भगाने और प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण मावली परघाव रस्म के तय तिथि पर न हो पाने को समाज ने परंपराओं की अक्षम्य अवहेलना बताया है।
सर्व आदिवासी समाज के संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने कड़े शब्दों में कहा- बस्तर दशहरा प्रशासनिक तंत्र का कोई पिकनिक या कमर्शियल इवेंट नहीं है। यह हमारे पुरखों की 600 साल पुरानी जीवंत आस्था का प्रतीक है। जब परंपराओं की सरेआम अनदेखी हो रही हो और पीड़ित परिवारों को न्याय न मिले, तो 84 परगना के मांझी-चालकी शांत नहीं बैठेंगे। अब हम सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।






