छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के उदयपुर इलाके में करंट से एक और हाथी की मौत हो गई है, जबकि केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ की साय सरकार ने हसदेव अरण्य में कोयला खदानों की नीलामी शुरू कर दी है जिस पर भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने पहले ही मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने की गंभीर चेतावनी दी थी।
सरगुजा के दुलदुला वन परिक्षेत्र (उदयपुर इलाका) में शिकारियों द्वारा बिछाए गए करंट वाले तार की चपेट में आकर एक नर हाथी की मौत हो गई। वन विभाग ने पोस्टमॉर्टम के बाद मृत हाथी को शासन के नियमों के अनुसार दफना दिया और छह आरोपियों को 18 घंटे के भीतर गिरफ्तार कर लिया। यह घटना उस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में हुई है जहाँ पहले से ही मानव-हाथी संघर्ष की लगातार रिपोर्टें आ रही हैं।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) भारत सरकार का प्रतिष्ठित संस्थान ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि हसदेव अरण्य में एक भी नई कोयला खदान खुलने पर मानव-हाथी संघर्ष इतना भयावह हो जाएगा कि उसे संभालना असंभव हो सकता है। WII के अनुसार, हसदेव में खनन से हाथी गलियारे (एलिफेंट कॉरिडोर) टूटेंगे और वन्यजीवों की आवाजाही बाधित होगी, जिससे टकराव की घटनाएं बढ़ेंगी। हसदेव अरण्य को “मध्य भारत के फेफड़े” कहा जाता है और यह 640 पौध प्रजातियों, 128 औषधीय पौधों, 92 पक्षी प्रजातियों तथा हाथी, भालू, तेंदुए जैसे लुप्तप्राय जानवरों का आवास है।
केंद्र सरकार ने हसदेव-अरण्य के तारा कोयला ब्लॉक की वाणिज्यिक नीलामी 2026 में पूरी कर दी है, जिसमें नौ बोलियां आईं और इसे 37.5% राजस्व हिस्सेदारी पर अडानी समूह की कंपनी CG Syn-Gas & Chemicals Ltd. को आवंटित किया गया। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि दिसंबर 2025 में छत्तीसगढ़ की मौजूदा साय सरकार ने केंद्र को पत्र लिखकर कहा था कि तारा कोयला खदान लेमरू हाथी गलियारे के बाहर है और इसे नीलामी में रखा जा सकता है। इसी अनुरोध के बाद ब्लॉक की सीमा बदली गई और इसे 15वें व्यावसायिक कोयला खनन दौर में शामिल किया गया।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार ने जून 2023 में तारा सहित 9 कोयला ब्लॉकों को नीलामी से बाहर रखने के लिए केंद्र को पत्र लिखा था, जिसके बाद केंद्र ने नीलामी रोक दी थी। लेकिन साय सरकार के दिसंबर 2025 के पत्र ने रास्ता साफ कर दिया। भूपेश बघेल ने मौजूदा साय सरकार पर सवाल उठाए हैं कि दिसंबर 2025 का पत्र किसके दबाव या स्वार्थ में लिखा गया, जबकि उनकी सरकार ने हसदेव की 40 खदानें डीनोटिफाई करवाई थीं।
एक तरफ सरगुजा में करंट से हाथी गिरा, दूसरी तरफ हसदेव में कोयला खदान की नीलामी केंद्र और साय सरकार दोनों पर तंज कसते हुए स्थानीय लोग और पर्यावरण प्रेमी पूछ रहे हैं: क्या विकास के नाम पर जंगल और हाथियों की कुर्बानी दी जा रही है? आदिवासी अधिकार (PESA, FRA), जल-जंगल-जमीन, और हाथी गलियारे का भविष्य सब कुछ दांव पर लगा है।
अब सवाल ये है क्या WII की चेतावनी को नजरअंदाज कर हसदेव जैसे संवेदनशील इलाके में कोयला खनन को मंजूरी देना लोकतंत्र और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी है? क्या साय सरकार का दिसंबर 2025 का पत्र किसी कॉर्पोरेट दबाव या स्वार्थ में लिखा गया? छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम (CMDC) का दावा है कि खनन सभी स्वीकृतियों के बाद ही होगा, लेकिन सवाल ये है जब नीलामी ही हो गई है, तो खनन में कितनी देर लगेगी? और तब तक कितने हाथी और कितने आदिवासी अपने जंगल-जल-जमीन से वंचित हो चुके होंगे?





