ST आरक्षण में 9% भील को? हाईकोर्ट ने राज्य-केंद्र से तलबा जवाब

Madhya Bharat Desk
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राजस्थान हाईकोर्ट ने एसटी के 12 फीसदी आरक्षण को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा किया है। अदालत ने पूछा है कि क्या इस 12 फीसदी कोटे में से 9 फीसदी आरक्षण भील समाज को नहीं दिया जाना चाहिए। इस मामले में कोर्ट ने राज्य सरकार, केंद्र सरकार और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से जवाब मांगा है और नोटिस जारी किए हैं।

याचिका आदिवासी भील आरक्षण संघर्ष समिति के सदस्यों ने दायर की है। इनका कहना है कि एसटी श्रेणी के अंदर सबको बराबर फायदा नहीं मिल रहा है। याचिका में दावा किया गया है कि मीणा समाज सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर काफी आगे बढ़ चुका है और एसटी आरक्षण का बड़ा हिस्सा इन्हीं को मिल रहा है, जबकि भील समुदाय को सरकारी नौकरियों और दूसरे मौकों पर उचित हिस्सा नहीं मिल पा रहा है।

यह मांग अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े फैसले के बाद जोर पकड़ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यों को एससी-एसटी के अंदर उप-वर्गीकरण यानी सब-क्लासीफिकेशन का अधिकार है, ताकि जो समूह सबसे ज्यादा पिछड़े हैं, उन्हें अलग से कोटा दिया जा सके लेकिन इसके लिए भरोसेमंद डेटा होना जरूरी है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी 25 फरवरी को राजस्थान के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर एसटी के भीतर उप-वर्गीकरण लागू करने की बात कही थी, मगर राज्य स्तर पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।

हाईकोर्ट में दायर याचिका में दावा किया गया है कि एसटी आरक्षण का करीब 99 फीसदी फायदा मीणा समाज ले रहा है। याचिका में यह भी कहा गया है कि 1931 के बाद भील समुदाय के प्रतिनिधित्व, पढ़ाई और आर्थिक हालत का कोई व्यापक सर्वे नहीं हुआ है। इसलिए मांग की गई है कि 12 फीसदी एसटी कोटे में से 9 फीसदी भील समुदाय के लिए अलग से आरक्षित किया जाए।

जनगणना 2011 और राजस्थान के आर्थिक सर्वेक्षण के हवाले से उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भील (और इससे मिलते-जुलते समूह) जनजातीय आबादी का बड़ा हिस्सा हैं और ये ज्यादातर दक्षिणी राजस्थान के जिलों—बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर वगैरह में केंद्रित हैं।

न्यायमूर्ति इन्द्रजीत सिंह और न्यायमूर्ति संदीप तनेजा की डिवीजन बेंच ने इस मामले में सीधे सवाल पूछे हैं: क्यों न 12 फीसदी एसटी कोटे में से 9 फीसदी भील के लिए अलग से आरक्षित किया जाए? क्या राज्य ने एसटी के भीतर उप-वर्गीकरण लागू करने के लिए डेटा-आधारित प्रक्रिया शुरू की है? और जब तक इस पर अंतिम फैसला न हो, क्या नियुक्तियों पर अस्थायी रोक लगानी चाहिए?

राजस्थान में कई दलित आदिवासी संगठन “कोटे के भीतर कोटा” और एससी-एसटी के लिए क्रीमी लेयर की मांग तेज कर रहे हैं। इनका कहना है कि आरक्षण का फायदा कुछ ही जातियों या समूहों तक सिमटकर रह गया है। इसी पृष्ठभूमि में भील समुदाय की मांग को अदालत ने गंभीरता से लिया है और सरकार से जवाब मांगा है।

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