नकटी विवाद: अनुभवी नेता बृजमोहन को ओ.पी. की बचकानी नसीहत

Madhya Bharat Desk
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‘अनुभव’ बनाम ‘अहंकार’ का प्रशासनिक कुरुक्षेत्र

नागेंद्र पाण्डेय, संपादक

छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों ‘नकटी ज़मीन विवाद’ महज़ एक भूखंड का मसला नहीं रह गया है, बल्कि यह संसदीय गरिमा, वरिष्ठता और प्रशासनिक समझ के बीच छिड़े एक मूक कुरुक्षेत्र का जीवंत उदाहरण बन चुका है। रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल और सूबे के आवास एवं पर्यावरण मंत्री ओ.पी. चौधरी के बीच सामने आया हालिया पत्राचार इस बात का दस्तावेज़ी प्रमाण है कि जब प्रशासनिक अनुभव की कमी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से टकराती है, तो विरोधाभासों के कैसे हास्यास्पद दृश्य निर्मित होते हैं।
मामले की जड़ में दो पत्र हैं जो साफ़ तौर पर बताते हैं कि जनता की आँख में धूल झोंकने और एक वरिष्ठ नेता को नीचा दिखाने की कोशिश में व्यवस्था ने खुद अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है।

तजुर्बे को ‘ज्ञान’ बांटने की बचकानी ज़िद
मंत्री ओ.पी. चौधरी का वह पत्र सुर्खियों में है, जिसमें उन्होंने आठ बार के विधायक, तीन दशकों से अधिक का संसदीय जीवन और 20 वर्षों से ज़्यादा समय तक कैबिनेट मंत्री रहे बृजमोहन अग्रवाल को ‘उचित स्थल पर पत्राचार करने’ की मर्यादा समझाई है। मंत्री महोदय का यह तर्क कि:
“विधायक कॉलोनी संबंधी निर्णय न हाउसिंग बोर्ड लेता है और न ही कोई विभागीय मंत्री… अतः उचित स्थल पर पत्राचार करने का कष्ट करें।”
यह न केवल संसदीय इतिहास के एक सबसे ‘ग्रेट’ और कद्दावर नेता की वरिष्ठता का अपमान करने जैसा है, बल्कि खुद को सर्वज्ञानी साबित करने की एक अपरिपक्व कोशिश भी है। बृजमोहन अग्रवाल जैसे कद्दावर राजनेता को, जो सरकार के संचालन की बारीकियाँ तब से जानते हैं जब वर्तमान के कई युवा नेता प्रशासनिक सेवा की एबीसीडी सीख रहे थे, उन्हें प्रक्रिया सिखाना अपने आप में एक राजनीतिक विडंबना है।

अपनी ही फाइलों के जाल में उलझे मंत्री
मंत्री ओ.पी. चौधरी ने पत्र लिखकर यह तो कह दिया कि इस विषयवस्तु में विभागीय मंत्री या विभाग का कोई लेना-देना या अधिकार नहीं है। लेकिन राजनीति में कथनी और करनी के भेद को दस्तावेज़ तुरंत बेनकाब कर देते हैं। दूसरा पत्र मंत्री के दावों को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है।

आवास एवं पर्यावरण विभाग के ही सचिव (अंकित आनंद) द्वारा रायपुर कलेक्टर को लिखे गए इस पत्र में साफ़ तौर पर:
ग्राम-नकटी में विशेष आवासीय योजना हेतु छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल (हाउसिंग बोर्ड) के आवेदन पर 29.172 हेक्टेअर शासकीय भूमि के आवंटन की बात की गई है।

कलेक्टर को निर्देश दिया गया है कि वे इस ज़मीन से ग्रामीणों के अतिक्रमण को हटाएं और मंडल को शीघ्र भूमि आवंटित करें।
अब सवाल यह उठता है कि यदि यह मामला आवास एवं पर्यावरण विभाग या हाउसिंग बोर्ड के कार्यक्षेत्र से बाहर का है, तो विभाग के सचिव किसके आदेश पर कलेक्टर को सीधे निर्देश जारी कर रहे हैं? क्या विभाग के भीतर क्या चल रहा है, इसकी जानकारी खुद विभागीय मंत्री को नहीं है? या फिर जानबूझकर एक वरिष्ठ सांसद के पत्र को रद्दी की टोकरी में दिखाने के लिए जनता को गुमराह करने का यह खेल रचा गया?

इस पूरे विवाद में ओ.पी. चौधरी बैकफुट पर नज़र आ रहे हैं। प्रशासनिक पत्रों के इस अंतर्विरोध ने यह साफ़ कर दिया है कि तजुर्बा आख़िरकार तजुर्बा होता है। एक तरफ जहाँ बृजमोहन अग्रवाल ने जनहित और जनप्रतिनिधियों के आवास से जुड़े गंभीर मुद्दे पर सीधे विभाग को घेरकर अपनी गहरी राजनैतिक समझ का परिचय दिया, वहीं दूसरी ओर युवा मंत्री केवल तकनीकी बारीकियों की आड़ में छिपते और गुमराह करते दिखाई दिए।

सत्ता का सिहांसन ज़िम्मेदारी मांगता है, नसीहतें नहीं। यदि विभाग ज़मीन आवंटन की फाइलों पर सक्रियता से दस्तखत कर रहा है, तो मंत्री का यह कहना कि ‘मेरा कोई अधिकार नहीं है’, केवल अपनी ज़िम्मेदारी से भागना और जनता को भ्रमित करना है। इस प्रशासनिक जंग में दस्तावेज़ों ने ओ.पी. चौधरी के दावों को बुरी तरह पटक दिया है, और यह साबित कर दिया है कि संसदीय राजनीति में ‘सीनियरिटी’ को कम आंकना हमेशा आत्मघाती होता है।

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