छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। जिले में कक्षा पहली से बारहवीं तक के लिए संचालित 1957 शासकीय स्कूलों में पिछले पांच वर्षों के दौरान विद्यार्थियों की संख्या लगातार घटती गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021-22 में जहां शासकीय स्कूलों में 1,70,980 विद्यार्थी अध्ययनरत थे, वहीं वर्ष 2025-26 में यह संख्या घटकर 1,41,503 रह गई। यानी सिर्फ पांच वर्षों में 29,477 विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों से दूरी बना ली।
यह स्थिति तब है जब सरकार स्कूल शिक्षा पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, विद्यार्थियों को मुफ्त पाठ्यपुस्तक, गणवेश, मध्यान्ह भोजन और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में लगातार घटता नामांकन शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
जिले में 1957 शासकीय स्कूल, फिर भी घट रहे छात्र
यू-डाइस 2023-24 के अनुसार महासमुंद जिले में 1277 प्राथमिक, 492 पूर्व माध्यमिक, 62 हाई स्कूल और 126 हायर सेकेंडरी सहित कुल 1957 शासकीय विद्यालय संचालित हैं। इतनी बड़ी संख्या में स्कूल होने के बावजूद विद्यार्थी निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं।
पालकों का कहना है कि कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी, गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई का अभाव, विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की उपलब्धता नहीं होना और बुनियादी सुविधाओं की कमी उन्हें अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने के लिए मजबूर कर रही है।
शिक्षक बोले- पढ़ाने से ज्यादा दूसरे कामों में लगते हैं
शिक्षकों का भी मानना है कि शिक्षा व्यवस्था पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का भारी दबाव है। चुनाव, सर्वे, जनगणना, विभिन्न सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक कार्यों में लगातार ड्यूटी लगने से शिक्षकों का अधिकांश समय पढ़ाई के बजाय अन्य कामों में निकल जाता है। इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और परिणामों पर पड़ रहा है।
निजी स्कूलों की चांदी, तीन साल में 7 हजार से ज्यादा छात्र बढ़े
जहां सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या तेजी से घटी है, वहीं निजी स्कूलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। जिले के 283 निजी विद्यालयों में वर्ष 2023-24 में 48,091 विद्यार्थी थे, जो 2024-25 में बढ़कर 51,835 और 2025-26 में 55,222 पहुंच गए। सिर्फ तीन वर्षों में निजी स्कूलों में 7,131 नए विद्यार्थियों का नामांकन हुआ है।
यह आंकड़ा साफ संकेत देता है कि अभिभावकों का झुकाव तेजी से निजी शिक्षा संस्थानों की ओर बढ़ रहा है।
शिक्षा विभाग के सामने बड़ा सवाल
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब सरकारी स्कूलों में मुफ्त सुविधाएं दी जा रही हैं और शिक्षा पर भारी बजट खर्च हो रहा है, तो फिर अभिभावकों का भरोसा क्यों कम हो रहा है? यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में कई सरकारी स्कूलों के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो सकता है।
शिक्षा विभाग के अधिकारी फिलहाल आंकड़ों की समीक्षा और जांच की बात कह रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात बताते हैं कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर लोगों का विश्वास कमजोर पड़ता जा रहा है।
सवाल जो जवाब मांग रहे हैं
- 5 साल में 29,477 विद्यार्थी सरकारी स्कूलों से क्यों बाहर हुए?
- शिक्षकों के हजारों पद खाली होने के बावजूद भर्ती क्यों नहीं?
- करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार क्यों नहीं?
- आखिर अभिभावक सरकारी स्कूल छोड़कर निजी स्कूलों की ओर क्यों जा रहे हैं?
महासमुंद के ये आंकड़े केवल एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ी उस बड़ी चुनौती की ओर इशारा करते हैं, जिस पर सरकार और शिक्षा विभाग को गंभीरता से जवाब देना होगा।





