कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय (KTU) में हाल ही में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) द्वारा किए गए प्रदर्शन ने छात्र राजनीति के स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस तरह छात्र हितों को पीछे छोड़कर निजी स्वार्थ और सोशल मीडिया की चमक-दमक को प्राथमिकता दी जा रही है, वह गंभीर चिंता का विषय है।
छात्र आंदोलनों का लोकतंत्र में हमेशा अहम रोल रहा है, लेकिन जब आंदोलन का मकसद सिर्फ फोटो खिंचवाना, रील बनाना और राजनीतिक फायदा लेना रह जाए, तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना लाजमी है।
इस घटना में सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि प्रदर्शन के दौरान विश्वविद्यालय की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया और कुछ लोगों पर व्यक्तिगत आरोप भी लगाए गए। एक ऐसा संस्थान जो भविष्य के पत्रकार तैयार करता है, वहां इस तरह का बर्ताव न तो सही है और न ही स्वीकार्य। यहां बातचीत और समाधान की जगह हंगामा और आरोप-प्रत्यारोप ज्यादा नजर आया।
यह भी कहा जा रहा है कि इस प्रदर्शन में बहुत कम छात्र शामिल हुए, लगभग 3 से 5 लोग ही सामने आए। अगर यह आंदोलन सच में सभी छात्रों की समस्याओं को लेकर होता, तो इसमें बड़ी संख्या में विद्यार्थी जुड़ते। इससे यह भी सवाल उठता है कि क्या यह पूरा मामला छात्रों की वास्तविक समस्याओं से ज्यादा राजनीतिक दिखावा था।
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जब राज्य में उसी विचारधारा से जुड़ी सरकार सत्ता में है, जिससे यह संगठन प्रेरित माना जाता है, तो फिर विश्वविद्यालय के भीतर इतना विरोध और हंगामा क्यों? अगर वास्तव में सुधार की मंशा होती, तो मांगें सरकार और शिक्षा विभाग के स्तर पर मजबूती से रखी जातीं।
छात्र संगठनों से यह उम्मीद की जाती है कि वे शिक्षा संस्थानों को राजनीति का मंच न बनाएं। अगर छात्र राजनीति में से दिखावा, फोटोबाजी और निजी हित हट जाएं, तभी वह आम छात्रों का भरोसा जीत सकती है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय जैसे संस्थान को किसी भी तरह के राजनीतिक प्रदर्शन का अखाड़ा नहीं बनने देना चाहिए।





