राघव चड्डा और AAP के 6 सांसद पार्टी छोड़कर BJP के तरफ मुड़ गए है। अगर राघव चड्ढा के 4 साल पहले पेश किए गए ‘दल-बदल विरोधी बिल‘ पास हो जाता तो न सिर्फ उनका सांसद का पद छिन जाता बल्कि 6 साल के लिए चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लग जाता।
आम आदमी पार्टी में नेता रहे राघव चढ्ढा और उनके साथ पार्टी के 6 अन्य सदस्यों ने पार्टी छोड़ बीजेपी का दामन थामा है। इस पूरे मामले में विरोधाभास छिपा हुआ हैं। अगर राघव चड्ढा के पेश किए गए पहला विधेयक पारित हो जाता तो, राघव चड्ढा खुद के इस पेश किए गए बिल में फंस जाते और सांसदी छिन जाने के साथ साथ 6 साल तक कोई चुनाव नहीं लड़ पाते या यूं कहे कि AAP को तोड़ नहीं पाते।
समझिए पूरा मामला
राघव चढ्ढा ने BJP में विलय के लिए ‘दो-तिहाई (2/3) बहुमत’ के नियम का हवाला दिया है। वर्तमान में राघव चड्ढा की सांसदी सुरक्षित है क्योंकि मौजूदा दल–बदल विरोधी कानून के तहत AAP के 10 सांसदों में से राघव चड्ढा को मिलाकर 7 सांसदों ने एक साथ पार्टी छोड़ा है जो 2/3 के आंकड़े को पार कर जाता है।
अपने ही बिल में फसते राघव चढ्ढा
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राघव चड्ढा ने राज्यसभा में प्रवेश के मात्र तीन महीने बाद ही प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया जिसमें दल बदल विरोधी कानून को और सख्त करने की मांग किया गया। अगर बिल पास हो जाता तो उस समय अरविंद केजरीवाल के सबसे करीबी माने जाने वाले राघव चढ्ढा को पार्टी बदलने के लिए 6 नहीं बल्कि 7 सदस्यों की जरूरत होती और पार्टी तोड़ने के लिए पूरे टीम के साथ 6 साल तक कोई चुनाव नहीं लड़ पाते।
राघव चड्ढा के 2022 के बिल के मुख्य प्रावधान
चड्ढा के इस “संविधान (संशोधन) विधेयक” का उद्देश्य “विधायकों द्वारा मतदाताओं की लोकतांत्रिक इच्छाओं की अनदेखी करते हुए किए जाने वाले अनैतिक दल-बदल” को रोकना था।
बिल में ये कड़े नियम सुझाए गए थेः
विलय की सीमा 2/3 से बढ़ाकर 3/4 करना: दसवीं अनुसूची में संशोधन कर किसी भी राजनीतिक दल के विलय को तभी वैध मानने का प्रस्ताव था, जब उस दल के कम से कम तीन-चौथाई (3/4) विधायक या सांसद सहमत हों। अभी यह सीमा दो-तिहाई (2/3) है।
6 साल का चुनाव प्रतिबंध: यदि कोई सांसद या विधायक चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदलता है, तो उसे अगले 6 वर्षों तक कोई भी चुनाव लड़ने से रोकने का प्रस्ताव रखा गया था।
‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ पर नियंत्रण: विधायकों की खरीद-फरोख्त और उन्हें होटल/रिसॉर्ट में छिपाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए यह सुझाव था कि सरकार से समर्थन वापस लेने के 7 दिनों के भीतर ऐसे जनप्रतिनिधियों को अनिवार्य रूप से सदन के अध्यक्ष के सामने पेश होना होगा। ऐसा न करने पर उन्हें अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
संविधान के किन प्रावधानों में बदलाव की मांग?
इस बिल के जरिए संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 के साथ-साथ दसवीं अनुसूची में संशोधन की मांग की गई थी, ताकि लोकतंत्र को मजबूत किया जा सके और जनप्रतिनिधियों को अधिक जिम्मेदार बनाया जा सके।
- अनुच्छेद 102(2) और 191(2): ये प्रावधान क्रमशः संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित करने से जुड़े हैं।
वर्तमान स्थिति
उस समय चड्ढा ने तर्क दिया था कि दल-बदल विरोधी कानून के बावजूद सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त की समस्या व्यापक है, जो लोकतंत्र पर सवाल खड़े करती है।
विडंबना यह है कि आज वही दो-तिहाई वाला नियम लागू है, जिसे बदलने की बात की गई थी। राज्यसभा के रिकॉर्ड के अनुसार यह बिल अब भी लंबित है।



