जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में संचालित आवासीय स्कूलों में बच्चों के पोषण आहार के नाम पर बड़ा खेल चल रहा है। आदिम जाति कल्याण विभाग, शिक्षा विभाग और समग्र शिक्षा के तहत संचालित इन संस्थाओं में ऐसा सिंडिकेट सक्रिय होने की चर्चा है, जो न सिर्फ सरकारी पैसे की बंदरबांट कर रहा है, बल्कि आदिवासी बच्चों की स्कॉलरशिप पर भी डाका डाल रहा है।
भारत सरकार ने सरकारी खरीदी में पारदर्शिता लाने और बिचौलियों की भूमिका खत्म करने के लिए जेम पोर्टल के माध्यम से सामग्री खरीदना अनिवार्य किया है। यह नियम छत्तीसगढ़ में भी लागू है। नवोदय और एकलव्य विद्यालयों में जेम पोर्टल के जरिए पारदर्शी खरीदी हो रही है, लेकिन जिले के कई अन्य आवासीय विद्यालयों में इससे अलग तस्वीर देखने को मिल रही है। सूत्रों के मुताबिक, बाजार भाव से 40 से 50 प्रतिशत अधिक कीमत पर सीधे दुकानदारों से सामान खरीदा जा रहा है। इसे सिर्फ खरीदी नहीं, बल्कि सुनियोजित भ्रष्टाचार बताया जा रहा है, जहां प्रतिस्पर्धा की कोई गुंजाइश नहीं है।
अधीक्षक सिर्फ नाम के जिम्मेदार
पूरे मामले की सबसे बड़ी विडंबना यह बताई जा रही है कि संस्थाओं के अधीक्षक और अधीक्षिकाएं सिर्फ दस्तखत करने तक सीमित रह गए हैं। फैसले कहीं और होते हैं और जिम्मेदारी उनके कंधों पर डाल दी जाती है। विरोध करने की स्थिति में उन्हें किनारे कर दिए जाने का डर रहता है, इसलिए वे मजबूरी में चुप्पी साधे रहते हैं।
सवाल यह है कि आखिर वह कौन लोग हैं, जो आदिवासी बच्चों के भोजन को कमाई का जरिया बना चुके हैं? दंतेवाड़ा जिले की कई संस्थाओं के साथ यदि सिर्फ एजुकेशन सिटी की बात करें, तो यहां आवासीय छात्रों के पोषण आहार में हर महीने करीब 50 लाख रुपये की खरीदी नियमों को ताक पर रखकर किए जाने की चर्चा है। गीदम स्थित आस्था जैसी संस्था में 1200 से अधिक छात्र-छात्राएं रह रहे हैं। वहीं अकेले एजुकेशन सिटी में करीब पांच हजार विद्यार्थियों के भोजन पर हर महीने 50 लाख रुपये से ज्यादा खर्च किए जाते हैं। आरोप है कि इतने बड़े बजट के बावजूद भंडारण नियमों और जेम पोर्टल के प्रावधानों की खुलेआम अनदेखी हो रही है।
बताया जा रहा है कि बच्चों को मिलने वाली 1500 से 2000 रुपये की मासिक स्कॉलरशिप की राशि का भी लाभ उन्हें पूरा नहीं मिल पा रहा है। हैरानी की बात यह है कि निजी एजेंसी के ऑडिट में सब कुछ सही बताया जाता है।
सबसे बड़ा सवाल ऑडिट व्यवस्था पर भी उठ रहा है। आखिर इतनी बड़ी अनियमितताएं ऑडिट में नजर क्यों नहीं आतीं? विभागीय अधिकारी इस नियम विरुद्ध खरीदी पर चुप क्यों हैं? और ऑडिट की फाइलों में यह पूरा मामला सही कैसे साबित हो जाता है? यह सीधे तौर पर बच्चों के अधिकार और सरकारी धन से जुड़ा गंभीर मामला है।
शासन के लिए चेतावनी
पोषण आहार के नाम पर चल रहा यह कथित खेल आदिवासी बच्चों के हिस्से का निवाला छीनने जैसा है। शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद नियमों की अनदेखी सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मिलीभगत की ओर भी इशारा करती है।
क्षेत्र के जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि जिला प्रशासन पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराए। एजुकेशन सिटी सहित जिले के शिक्षा विभाग, समग्र शिक्षा और आदिम जाति कल्याण विभाग के सभी आवासीय विद्यालयों में पोषण आहार खरीदी की निष्पक्ष जांच हो।
साथ ही भ्रष्टाचार में शामिल लोगों और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए। जेम पोर्टल के माध्यम से प्रतिस्पर्धी दरों पर और भंडारण नियमों का पालन करते हुए खरीदी अनिवार्य बनाई जाए, ताकि बच्चों को बेहतर पोषण मिल सके और शासन के लाखों रुपये भी बच सकें।
अगर समय रहते इस कथित पोषण माफिया पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह आदिवासी बच्चों के भविष्य के साथ गंभीर अन्याय होगा। अब शासन को तय करना है कि वह बच्चों के हित में खड़ा है या फिर उन लोगों के साथ, जो उनकी थाली से निवाला छीनकर अपनी जेबें भर रहे हैं।






