भारत की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। केरल में वामपंथी गठबंधन की हार के साथ ही देश में वाम दलों की सत्ता का अध्याय लगभग समाप्त होता नजर आ रहा है। 1977 के बाद यह पहली बार है जब किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं बची है।
केरल, जिसे लंबे समय से वामपंथ का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था, अब उनके हाथ से निकल चुका है। यहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाला एलडीएफ पिछले दस वर्षों से सत्ता में था और इस बार भी वापसी की उम्मीद कर रहा था। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने चुनाव में बढ़त बनाते हुए सत्ता हासिल कर ली।
अगर इतिहास पर नजर डालें तो केरल में 1957 में पहली बार कम्युनिस्ट सरकार बनी थी। ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में बनी यह सरकार दुनिया की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई वामपंथी सरकार मानी जाती है। तब से लेकर अब तक राज्य में एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सत्ता का बदलाव होता रहा है।
वहीं पश्चिम बंगाल में वामपंथ का दौर 1977 से 2011 तक चला। ज्योति बसु और बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में यहां 34 साल तक वाम दलों का शासन रहा। लेकिन 2011 में ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस ने इस लंबे शासन का अंत कर दिया।
त्रिपुरा में भी वामपंथी दलों का प्रभाव काफी मजबूत था। 1977 में यहां पहली बार वाम सरकार बनी और 2018 तक उनका शासन चला। माणिक सरकार के नेतृत्व में पार्टी ने लंबे समय तक सत्ता संभाली, लेकिन बाद में भाजपा ने चुनाव जीतकर सत्ता बदल दी।
बदलते सामाजिक और आर्थिक हालात, युवाओं की नई अपेक्षाएं और विकास की राजनीति ने वामपंथी दलों के पारंपरिक आधार को कमजोर किया है। यही कारण है कि उनका प्रभाव अब धीरे-धीरे सीमित होता जा रहा है।



