छत्तीसगढ़ की पहचान कभी उसके घने जंगलों और समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों से होती थी, लेकिन अब वही जमीन और जंगल एक बड़े विवाद का केंद्र बनते जा रहे हैं। राज्य में खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के बढ़ते विस्तार ने पर्यावरण और स्थानीय जीवन दोनों पर गहरा असर डाला है।
आरोप लग रहे हैं कि विष्णु देव साय की सरकार गौतम अडानी को हमारी जंगल–जमीन देकर भारत का पहला सबसे अमीर आदमी बना दिया और छत्तीसगढ़ के लोगों और आदिवासियों को तड़पने के लिए छोड़ दिया है। विरोध करने वाले स्थानीय और आदिवासी समुदायों का कहना है कि उनकी जल–जंगल–जमीन पर फैसले उनकी भागीदारी के बिना लिए जा रहे हैं।
राज्य के अलग-अलग इलाकों में लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। कभी खनन के खिलाफ, कभी पेड़ों की कटाई के खिलाफ लोग अपनी जमीन और संसाधनों को बचाने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या इन आवाज़ों को सुना जा रहा है?
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा बदलाव पर्यावरण में दिख रहा है। सरगुजा का मैनपाट, जिसे “छत्तीसगढ़ का शिमला” कहा जाता था, अब बढ़ती गर्मी की चपेट में है। स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले जहां गर्मियों में भी ठंड का अहसास होता था, वहीं अब हालात बदल चुके हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, कोयला, बॉक्साइट, आयरन ओर और डोलोमाइट जैसे खनिजों के लिए तेज़ी से हो रही खुदाई और जंगलों की कटाई ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। इसका असर सिर्फ तापमान पर ही नहीं, बल्कि जल स्रोतों और जैव विविधता पर भी पड़ रहा है।
“विकास” की इस दौड़ में जहां कॉर्पोरेट मुनाफा बढ़ता दिख रहा है, वहीं आम लोग और आदिवासी समुदाय अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए जूझते नजर आ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है क्या विकास का रास्ता ऐसा होना चाहिए, जहां जंगल खत्म हों, जल संकट बढ़े और स्थानीय लोग ही अपने हक के लिए संघर्ष करें?



