मद्रास हाईकोर्ट का SC/ST एक्ट पर ऐतिहासिक फैसला: ‘समुदाय की सुरक्षा के लिए कानून, रंजिश का हथियार नहीं!’ तीन पुलिस अधिकारियों को मिली राहत, दुरुपयोग पर लगी सख्त चेतावनी
चेन्नई, 23 मार्च 2026: मद्रास हाईकोर्ट ने SC/ST (अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण) एक्ट के बढ़ते दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द कर दिया। जस्टिस एम. सत्यनारायणन की एकलपीठ ने इसे ‘दुरुपयोग का क्लासिक उदाहरण’ बताते हुए कहा कि यह कानून दलित समुदायों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, न कि व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने या निर्दोषों को फंसाने के लिए।
मामले का पूरा विवरण:
यह मामला तमिलनाडु के एक पुलिस स्टेशन से जुड़ा है, जहां एक स्थानीय वकील ने तीन अधिकारियों—इंस्पेक्टर रवि कुमार, सब-इंस्पेक्टर प्रिया और कांस्टेबल मुरुगन—के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज कराई थी। वकील का दावा था कि अधिकारियों ने उसे जातिगत गाली दी और अपमानित किया। लेकिन कोर्ट ने जांच रिपोर्ट, CCTV फुटेज और उपलब्ध साक्ष्यों का गहन अध्ययन करने के बाद पाया कि कथित घटना पुलिस स्टेशन की ‘चारदीवारी’ के अंदर हुई थी, जो ‘सार्वजनिक दृश्य’ (पब्लिक व्यू) की श्रेणी में नहीं आती। कोर्ट ने नोट किया कि वकील के आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र गवाह नहीं थे—सिर्फ उसकी एकतरफा शिकायत।
कोर्ट की तीखी टिप्पणियां:
फैसले में जस्टिस ने कहा, “SC/ST एक्ट एक महत्वपूर्ण सामाजिक कानून है, जो सदियों की जातिगत हिंसा के खिलाफ ढाल है। लेकिन हाल के वर्षों में इसका इस्तेमाल व्यक्तिगत रंजिश, बदले की भावना या पुलिसकर्मियों को ब्लैकमेल करने के लिए हो रहा है। बिना ठोस सबूतों के केवल ‘खोखले आरोपों’ पर केस दर्ज करना न्यायिक प्रक्रिया का अपमान है।” कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों में तुरंत प्रारंभिक जांच करें और बिना आधार के गिरफ्तारी न करें। साथ ही, शिकायतकर्ता को कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई।
कानूनी पृष्ठभूमि और महत्व:
SC/ST एक्ट 1989 में लागू हुआ था, जिसे 2018 में संशोधित कर गिरफ्तारी पर रोक हटा दी गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ‘डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन’ मामले में दुरुपयोग रोकने के लिए प्रारंभिक जांच का प्रावधान किया था। मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला उसी दिशा में एक मील का पत्थर है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल निर्दोष पुलिसकर्मियों को राहत मिलेगी, बल्कि एक्ट की साख भी बचेगी। तमिलनाडु पुलिस महासंघ ने इसे ‘ऐतिहासिक’ बताते हुए सराहना की है।
प्रभाव और सीख:
यह फैसला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। विपक्षी दलों ने इसे ‘दलित विरोधी’ बताकर आलोचना की, जबकि समर्थकों ने इसे ‘न्याय का संतुलन’ कहा। कोर्ट ने अंत में स्पष्ट संदेश दिया: “कानून का मकसद न्याय देना है, निर्दोषों को जेल भेजना नहीं। दुरुपयोग रोकना हम सबकी जिम्मेदारी है।”
तमिलनाडु सरकार ने फैसले पर अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन आधिकारिक सूत्रों के अनुसार उच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन किया जाएगा।



