शिक्षा विभाग का अजीबो गरीब आदेश! छात्रों के भविष्य से खिलवाड़? क्या यही सुशासन?

Madhya Bharat Desk
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रायपुर। राज्य में बेहतर प्रशासन और पारदर्शिता का दावा करने वाली विष्णुदेव साय सरकार के इस आदेश ने अब ‘सुशासन’ की परिभाषा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ही आदेश में किसी पाठ्यक्रम को भविष्य के लिए उदाहरण न मानने की बात भी कही जा रही है और उसी डिप्लोमा को मान्यता भी दी जा रही है।

छत्तीसगढ़ में पीजीडीआरडी (पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन रूरल डेवलपमेंट) को लेकर विवाद अब और उलझता नजर आ रहा है। इसकी वजह उच्च शिक्षा विभाग का एक ऐसा आदेश बना है जिसे लेकर शिक्षा जगत में हैरानी जताई जा रही है।

दरअसल, राज्य सरकार ने एक ही आदेश में पहले इस पाठ्यक्रम को लेकर सवाल खड़े किए और भविष्य में इसे उदाहरण नहीं मानने की बात कही, लेकिन साथ ही इस पाठ्यक्रम को पूरा कर चुके छात्रों के डिप्लोमा को मान्यता भी दे दी। इसी विरोधाभासी आदेश ने पूरे मामले को और पेचीदा बना दिया है।

आईएसबीएम विश्वविद्यालय की डिग्री पर उठे सवाल

मामला आई.एस.बी.एम. विश्वविद्यालय, छुरा (जिला गरियाबंद) द्वारा संचालित पीजीडीआरडी (पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन रूरल डेवलपमेंट) से जुड़ा है। आरोप है कि विश्वविद्यालय को इस पाठ्यक्रम की विधिवत मान्यता नहीं थी, इसके बावजूद छात्रों को डिप्लोमा जारी किए गए और भर्ती प्रक्रिया में उसका लाभ भी मिलने लगा।

सरकार का आदेश बना चर्चा का केंद्र

24 दिसंबर 2025 को उच्च शिक्षा विभाग ने एक आदेश जारी किया जिसमें कहा गया कि:

आईएसबीएम विश्वविद्यालय से पीजीडीआरडी पूरा कर चुके छात्रों के डिप्लोमा मान्य माने जाएंगे लेकिन भविष्य में इसे उदाहरण नहीं माना जाएगा। साथ ही विश्वविद्यालय को निर्देश दिया गया कि इस पाठ्यक्रम को Arts & Humanities संकाय के अंतर्गत शामिल किया जाए।

इसी आदेश को लेकर शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने एक ही आदेश में दो अलग-अलग संदेश दे दिए हैं, जिससे पूरे मामले में भ्रम की स्थिति बन गई है।

विष्णुदेव साय की सरकार में क्या यही वह प्रशासनिक स्पष्टता है, जिसे सुशासन कहा जाता है? भर्ती की उम्मीद लगाए बैठे हजारों अभ्यर्थियों के बीच अब चर्चा यही है कि अगर फैसले इतने उलझे हुए होंगे, तो सुशासन का दावा आखिर जमीन पर कितना मजबूत है। अब पूरे मामले में सबकी नजर अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हुई है।

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