देश के विश्वविद्यालय आज ज्ञान के नहीं, बल्कि जातिगत ज़हर के प्रयोगशाला बनते जा रहे हैं—और सत्ता खामोश है। UGC से जुड़े कानून पर उठी बहस अब एक खतरनाक मोड़ पर है। सवाल अब यह नहीं कि बिल अच्छा है या बुरा, सवाल यह है कि क्या शिक्षा के मंदिर में जातिवाद फैलाने वालों पर कभी कार्रवाई होगी भी, या संसद सिर्फ बचाव की ढाल बनकर रह जाएगी?
UGC बिल को लेकर यह आरोप लगातार गहराता जा रहा है कि इसने शिक्षा व्यवस्था में जातिगत विभाजन को संस्थागत रूप दे दिया है। लेकिन इससे भी गंभीर बात यह है कि जिस प्रक्रिया से यह बिल बना, उसमें शामिल चेहरों पर उंगली उठाने से सत्ता डर रही है।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से सीधा सवाल है—
क्या UGC बिल से जुड़े समिति सदस्यों के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी? या फिर “जाति की आग किसने लगाई?”—यह सवाल फाइलों में ही दफन कर दिया जाएगा?
तथ्य चीख-चीखकर सच बता रहे हैं।
UGC से संबंधित समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह रहे, लेकिन उस समय संसद में 60 प्रतिशत से अधिक सांसद BJP के थे। समिति में जिन नामों की भूमिका निर्णायक रही—
- दिग्विजय सिंह (राजपूत),
- रवि शंकर प्रसाद (कायस्थ),
- संबित पात्रा (ब्राह्मण),
- करण भूषण सिंह (राजपूत),
- बांसुरी स्वराज (ब्राह्मण),
- रेखा शर्मा (ब्राह्मण)।
स्पष्ट है कि सत्ता, नीति और निर्णय—तीनों पर सामान्य वर्ग के नेताओं का दबदबा रहा।

राज्यसभा से 10 और लोकसभा से 20 सांसदों की भागीदारी के साथ लिया गया फैसला किसी “भूल” का नतीजा नहीं था, बल्कि सत्ता के शीर्ष पर रची गई एक सोची-समझी प्रक्रिया थी।

इसके बावजूद आज राजनीतिक दल एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं। कोई कांग्रेस को दोषी बता रहा है, कोई BJP को। लेकिन सच यह है कि UGC बिल की जिम्मेदारी सामूहिक है।
तो फिर सवाल उठता है—
अगर यह बिल “सामान्य वर्ग के खिलाफ पाप” है, तो उसके गुनहगार कौन हैं? और अगर पाप नहीं है, तो देश को गुमराह क्यों किया जा रहा है?
शिक्षाविदों और छात्र संगठनों का आरोप और भी गंभीर है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों में जातिवादी नारों, धमकियों और विभाजनकारी भाषा को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है। यही वजह है कि न कोई जांच बैठती है, न कोई जवाबदेही तय होती है। संसद में अब तक एक भी ऐसी बहस नहीं हुई, जिसमें UGC बिल के विवादित प्रावधानों पर नाम लेकर सवाल पूछे गए हों।
राजनीतिक विश्लेषक साफ कहते हैं—
“भारत तोड़ने वाली राजनीति” का तमगा विपक्ष पर चिपकाना आसान है, लेकिन जब नीतियां खुद समाज को तोड़ने लगें, तब आईना देखने की हिम्मत सत्ता में नहीं बचती। देश अब आर-पार की लड़ाई चाहता है।
क्या संसद सिर्फ शोर, हंगामा और बचाव की राजनीति के लिए है? या फिर शिक्षा के मंदिर में जातिवाद का ज़हर घोलने वालों को बेनकाब कर सजा देने की हिम्मत भी रखती है?


