विलुप्ति की ओर हरबोला संप्रदाय की सदियों पुरानी स्तुति-गायन परंपरा

Madhya Bharat Desk
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पेड़ों पर चढ़कर जगाते हैं गांव, दान-धर्म की देते हैं सीख

कभी भोर होते ही गांव की नींद हराम कर देने वाली गूंजती आवाज़, आज पहचान के संकट से जूझ रही है। हरबोला संप्रदाय की वह अनूठी परंपरा, जिसमें सूर्योदय से पहले पेड़ों पर चढ़कर स्तुति-गान किया जाता है, अब धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।

बचपन में सुनी गई पंक्तियां—
“बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी है, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी है…”
आज इन्हीं हरबोलों को बहुत कम लोग पहचानते हैं।

सुबह 5 बजे पेड़ों से गूंजती है आवाज

कवर्धा से लेकर बालोद जिले के कई गांवों तक आज भी कुछ हरबोले भोर में गांव पहुंचते हैं। बरगद, पीपल या नीम के ऊंचे पेड़ों पर चढ़कर वे शंखनाद करते हैं और कबीर, तुलसीदास के दोहे, धर्म-उपदेश और लोक स्तुतियां गाकर लोगों को जगाते हैं। उनकी आवाज सुनकर ग्रामीण जागते हैं और दान-धर्म के लिए आगे आते हैं।

इस परंपरा की खास बात यह है कि दान मिलने से पहले हरबोले पेड़ से नीचे नहीं उतरते। हाल ही में बालोद जिले के जगन्नाथपुर गांव में ऐसा ही दृश्य देखने को मिला, जहां तीन हरबोले महाराज अलग-अलग पेड़ों पर चढ़कर सुबह 5 बजे से स्तुति-गान करते नजर आए। श्रद्धालुओं ने अपनी क्षमता अनुसार उन्हें दान दिया।

बदलते समय में घटता मान-सम्मान

हरबोले संजय गोस्वामी बताते हैं कि समय के साथ लोगों की सोच बदल गई है।
“पहले एक आवाज में पूरी बस्ती जाग जाती थी। एक घंटे के भीतर दान-धर्म का कार्य पूरा हो जाता था, लेकिन अब लोग इस परंपरा में रुचि नहीं लेते। मैं अपने परिवार की चौथी पीढ़ी हूं, जो इसे निभा रही है। आगे हमारी आने वाली पीढ़ी इसे संभाल पाएगी या नहीं, कहना मुश्किल है।”

उन्होंने बताया कि हरबोले सूर्योदय से पहले मंत्रों की स्तुति कर गांव की रक्षा, सुख-समृद्धि और दानदाताओं के कल्याण की कामना करते हैं।

कभी राजाओं की गाथाएं सुनाते थे हरबोले

एक समय था जब यही हरबोले राजा-महाराजाओं, वीर योद्धाओं और ऐतिहासिक युद्धों की गाथाएं अपने खास अंदाज में सुनाकर जीवन यापन करते थे। आज मोबाइल और इंटरनेट के दौर में इस लोककला के श्रोता लगभग खत्म हो चुके हैं।

हरबोले आज भी राम गुणगान, कबीर के दोहे और पराक्रमी राजाओं की वीर कथाएं गाते हैं, लेकिन सम्मान और पहचान दोनों कम होती जा रही हैं। नई पीढ़ी इस परंपरा से लगभग अनजान है, जिससे यह समृद्ध लोक परंपरा विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई है।

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