देश में बढ़ा एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस संकट, 30 में से 28 दवाएँ हुईं बेअसर

Madhya Bharat Desk
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आगरा। देश में एंटीबायोटिक के गलत और अंधाधुंध उपयोग से दवाओं का असर लगातार कम होता जा रहा है। एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा और किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) लखनऊ द्वारा किए गए संयुक्त अध्ययन में यह चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि परीक्षण में शामिल 30 एंटीबायोटिक दवाओं में से 28 अब गंभीर रूप से प्रभावहीन हो चुकी हैं। अध्ययन में पाया गया कि अधिकांश दवाओं पर बैक्टीरिया ने रेजिस्टेंस विकसित कर लिया है, जिससे इलाज और अधिक जटिल हो गया है।

अध्ययन में शामिल मेडिकल विशेषज्ञों ने इसे “बढ़ते स्वास्थ्य संकट का संकेत” बताया है और कहा है कि अगर दवाओं का दुरुपयोग नहीं रुका तो साधारण संक्रमण भी भविष्य में जानलेवा साबित हो सकते हैं।

522 मरीजों के नमूनों पर किया गया परीक्षण

अध्ययन एसएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती 522 मरीजों के नमूनों पर आधारित है। यह मरीज 10 से 70 वर्ष के आयु वर्ग से संबंधित थे। इनमें—

  • सर्जरी से पहले और बाद के मरीज
  • सड़क दुर्घटना या अन्य हादसों में घायल लोग
  • घाव संक्रमण वाले मरीज
  • पुरानी बीमारी और गंभीर संक्रमण वाले मरीज

शामिल किए गए।

ग्राम-नेगेटिव संक्रमण सर्वाधिक

जांच में पाया गया कि अधिकांश मरीजों में ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरियल संक्रमण मौजूद था। इनमें—

  • यूटीआई (मूत्र संक्रमण)
  • सेप्सिस
  • घाव के संक्रमण
  • निमोनिया

सबसे अधिक पाए गए।

मरीजों में मिले प्रमुख बैक्टीरिया थे—
क्लेब्सिएला, ई-कोलाई, एसीटोबैक्टर और स्यूडोमोनास।

कल्चर–सेंसिटिविटी टेस्ट में सामने आई गंभीर स्थिति

अध्ययन के दौरान मरीजों के नमूनों का कल्चर एंड सेंसिटिविटी टेस्ट किया गया।
इसमें बैक्टीरिया को अलग कर विभिन्न दवाओं के संपर्क में रखा गया।

रिपोर्ट में पाया गया कि—

  • कई दवाओं में 20% से 90% तक रेजिस्टेंस दर्ज हुआ
  • यानी दवाएँ बैक्टीरिया को मार नहीं पा रहीं
  • सिर्फ दो एंटीबायोटिक ही लगातार प्रभावी पाई गईं
  • तीन दवाएँ कुछ मामलों में कारगर, लेकिन कई मामलों में कमजोर रहीं

विशेषज्ञों के अनुसार यह तथ्य बेहद चिंताजनक है क्योंकि यह संकेत देता है कि इलाज के लिए उपलब्ध दवाएँ तेजी से खत्म होती जा रही हैं।

गलत उपयोग सबसे बड़ी वजह

अध्ययन में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस बढ़ने के पीछे कई मुख्य कारण सामने आए—

1. झोलाछाप डॉक्टरों द्वारा गलत दवा देना

झोलाछाप या बिना डिग्री वाले लोग हर बीमारी में एंटीबायोटिक दे देते हैं, जिससे रेजिस्टेंस तेजी से बढ़ता है।

2. मेडिकल स्टोर से बिना पर्ची दवा लेना

ओवर-द-काउंटर उपलब्ध दवाएँ, और कई बार खराब गुणवत्ता वाली दवाएँ, बैक्टीरिया को और मजबूत बना देती हैं।

3. वायरल और फंगल संक्रमण में अनावश्यक एंटीबायोटिक

विशेषज्ञों के अनुसार, केवल बैक्टीरियल संक्रमण में ही एंटीबायोटिक दी जानी चाहिए।
लेकिन व्यवहार में—

  • 25–30% वायरल
  • 10–15% फंगल संक्रमण
    में भी एंटीबायोटिक लिख दी जाती है।

यह दवाओं का सीधा दुरुपयोग है।

4. अस्पतालों में संक्रमण रोकथाम की कमी

अस्पतालों में साफ-सफाई के अभाव में नोसोकोमियल इंफेक्शन (हॉस्पिटल इंफेक्शन) बढ़ते हैं।
ऐसे मामलों में दवाओं का अधिक उपयोग होता है, जो रेजिस्टेंस को बढ़ावा देता है।

5. कल्चर रिपोर्ट के बिना दवा लिखना

रेजिस्टेंस के बावजूद कई डॉक्टर बिना कल्चर–सेंसिटिविटी जांच के ही एंटीबायोटिक लिख देते हैं, जिससे समस्या और बढ़ती है।

विशेषज्ञों की चेतावनी

अध्ययन से जुड़े डॉक्टरों ने कहा—

“दवाओं की प्रभावशीलता में इतनी भारी गिरावट भविष्य के लिए बेहद खतरनाक संकेत है। यदि इसी गति से रेजिस्टेंस बढ़ता रहा, तो सामान्य संक्रमण का इलाज भी मुश्किल हो जाएगा।”

उन्होंने कहा कि मरीजों का इलाज अब और चुनौतीपूर्ण हो गया है क्योंकि आखिरी लाइन की दवाएँ भी धीरे-धीरे असर खोने लगी हैं।

देश के लिए बड़ा स्वास्थ्य जोखिम

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते एंटीबायोटिक के गलत उपयोग को नियंत्रित नहीं किया गया, तो देश में स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव पड़ेगा।
अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए संक्रमण से बचाव चुनौतीपूर्ण होगा और मृत्यु दर बढ़ने की आशंका भी है।

अध्ययन स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस अब देश में तेजी से फैल रहा है।
यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर चुनौती है।
गलत दवा उपयोग, झोलाछाप इलाज, ओटीसी दवाएँ और अस्पतालों में संक्रमण रोकथाम की कमी—इन सबने इस संकट को और बढ़ा दिया है।

विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि एंटीबायोटिक केवल पंजीकृत डॉक्टर की सलाह पर ही लें और दवाओं को पूरा कोर्स पूरा करें।

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