विष्णुदेव साय के गृह जिले में तिरपाल के नीचे शिक्षा, जशपुर में बारिश में भीगते हुए पढ़ रहे बच्चे

Madhya Bharat Desk
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छत्तीसगढ़ में “पढ़ेगा भारत, तभी तो बढ़ेगा भारत” जैसे नारों के बीच हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गृह ज़िले जशपुर में सैकड़ों बच्चे ऐसी जगहों पर पढ़ाई कर रहे हैं, जहां छत नहीं है, दीवारें टूट चुकी हैं और बारिश में तिरपाल के नीचे बैठना ही उनकी मजबूरी बन गई है।

478 स्कूल जर्जर, 1574 बिना भवन के

जिले में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के कुल 478 स्कूल ऐसे हैं जो इस कदर जर्जर हो चुके हैं कि कभी भी गिर सकते हैं। वहीं 1574 स्कूल ऐसे हैं जिनमें या तो भवन है ही नहीं, या फिर वे बेहद खस्ताहाल हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति ग्रामीण इलाकों की है, जहां बारिश में तिरपाल डालकर कक्षा लगाई जाती है।

बारिश आई, क्लास गई

जशपुर के बगीचा, पत्थलगांव, कुनकुरी, और नारायणपुर ब्लॉक के स्कूलों की हालत देखकर लगता है जैसे ये किसी आपदा क्षेत्र के राहत शिविर हों। कहीं छत से लगातार पानी टपकता है, तो कहीं बच्चे गीली ज़मीन पर बैठकर किताबें भीगने से बचा रहे हैं।

  • जाराडोल: यहां के स्कूल में बच्चे प्लास्टिक की तिरपाल के नीचे बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं क्योंकि छत से लगातार पानी टपकता है।
  • अंकरा: प्लास्टर झड़ चुका है, दीवारें सीलन भरी हैं और छत पर बंधी तिरपाल ही एकमात्र सुरक्षा है।
  • नारायणपुर: बच्चे खुद लकड़ी, तिरपाल और बोरी लेकर आते हैं ताकि बारिश में किसी तरह बैठ सकें।
  • पत्थलगांव: बारिश के दिनों में स्कूलों में पढ़ाई रोक दी जाती है क्योंकि छतें पूरी तरह जर्जर हैं।

सरकारी आयोजनों पर खर्च हो रहा करोड़ों, स्कूल भवनों को नहीं बजट

स्थानीय लोगों का कहना है कि जब सरकार के पास सरकारी भवन हैं, तब भी लाखों रुपये निजी रिसॉर्ट में सरकारी कार्यक्रमों पर खर्च किए जाते हैं। यदि यही पैसा स्कूल भवनों के निर्माण पर लगाया जाए, तो हर बच्चे को पक्का भवन और सुरक्षित शिक्षा मिल सकती है।

प्रशासनिक दावे, ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर

जिला प्रशासन द्वारा स्कूलों की मरम्मत और भवन निर्माण की बात कही जाती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई खास प्रगति नहीं दिखती। कलेक्टर द्वारा कई बार निर्देश दिए गए, लेकिन अधिकांश स्कूलों में हालात जस के तस हैं।

जशपुर जैसे आदिवासी बहुल और शैक्षिक रूप से पिछड़े जिले में शिक्षा की ये स्थिति शर्मनाक है। आने वाली पीढ़ी तिरपाल के नीचे भीगकर पढ़ रही है – यह न केवल प्रशासन की नाकामी है, बल्कि एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती है:

क्या बच्चों की शिक्षा, सरकार की प्राथमिकता में अब भी नहीं है?

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