आईएसबीएम विश्वविद्यालय में अमान्य डिग्री का आरोप: PGDRD डिप्लोमा पर विवाद

Madhya Bharat Desk
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आई.एस.बी.एम. विश्वविद्यालय, छुरा (जिला गरियाबंद) द्वारा पी.जी.डी.आर.डी. (पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन रूरल डेवलपमेंट) की डिग्री दिए जाने को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। आरोप है कि विश्वविद्यालय को इस पाठ्यक्रम की मान्यता प्राप्त नहीं है, इसके बावजूद डिग्री जारी की जा रही है और भर्ती प्रक्रिया में इसका लाभ दिया जा रहा है।

इस पूरे मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी कर आईएसबीएम विश्वविद्यालय से पीजीडीआरडी डिप्लोमा प्राप्त उम्मीदवारों को नियुक्ति आदेश जारी करने पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।

200 पदों की भर्ती से जुड़ा है मामला

दरअसल, 27 फरवरी 2024 को विकास आयुक्त कार्यालय ने सहायक विकास विस्तार अधिकारी के 200 पदों की भर्ती के लिए आदेश जारी किया था। भर्ती नियमों में स्पष्ट किया गया था कि उम्मीदवार के पास किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि होना अनिवार्य है। साथ ही ग्रामीण विकास में स्नातकोत्तर उपाधि या स्नातकोत्तर डिप्लोमा रखने वाले अभ्यर्थियों को प्राथमिकता देने का प्रावधान भी रखा गया था।

इसी प्रावधान के तहत आईएसबीएम विश्वविद्यालय से प्राप्त पीजीडीआरडी डिग्री की वैधता को लेकर विवाद खड़ा हो गया और मामला न्यायालय तक पहुंच गया।

समिति की रिपोर्ट में भी उठे सवाल

याचिकाकर्ताओं की आपत्ति के बाद 16 सितंबर 2025 को एक जांच समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने 9 अक्टूबर 2025 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

रिपोर्ट में कहा गया कि आईएसबीएम विश्वविद्यालय द्वारा संचालित पीजीडीआरडी कार्यक्रम विश्वविद्यालय के अध्यादेश क्रमांक 57 के अंतर्गत चलाया जा रहा है, जो वाणिज्य एवं प्रबंधन संकाय के डिप्लोमा पाठ्यक्रमों से संबंधित है। ऐसे में ग्रामीण विकास से जुड़े इस पाठ्यक्रम की वैधता और मान्यता पर गंभीर सवाल उठे हैं।

पात्र अभ्यर्थियों में नाराजगी

इस विवाद के बीच उन अभ्यर्थियों में भी नाराजगी बढ़ रही है, जिन्होंने मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों से डिग्री हासिल की है और जो इस पद के लिए पूरी तरह पात्र हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रिया में विवाद के कारण अब भी बेरोजगार बैठे हैं। उनका कहना है कि यदि अमान्य डिग्री के आधार पर भर्ती होती है तो इससे योग्य उम्मीदवारों के अधिकार प्रभावित होंगे।

विनियामक आयोग भी शामिल?

इस मामले में निजी विश्वविद्यालयों की निगरानी के लिए गठित राज्य निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी निजी विश्वविद्यालय में किसी पाठ्यक्रम की वैधता या मान्यता को लेकर विवाद है, तो उसकी जांच और निगरानी की जिम्मेदारी इसी आयोग की होती है लेकिन आयोग ही इसमें शामिल हो तो उसकी जांच करना किसकी जिम्मेदारी है?

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