नई दिल्ली। अमेरिका द्वारा 27 अगस्त से लगाए गए अतिरिक्त 50% आयात शुल्क का असर भारतीय निर्यातकों और किसानों पर भारी पड़ रहा है। यह शुल्क राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की व्यापार नीति का हिस्सा है, और अब इसके परिणाम भारतीय उद्योग और कृषि दोनों झेल रहे हैं।
किसानों और निर्यातकों पर दबाव
कपास पर शुल्क का सीधा असर किसानों पर पड़ा है। मंडियों में कपास के दाम प्रति क्विंटल ₹1,100 तक गिर चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि दिसंबर तक शुल्क हटाए नहीं गए, तो भारतीय किसानों को बड़ा घाटा उठाना पड़ेगा। यही हाल अन्य निर्यातकों का भी है—कपड़ा उद्योग, स्टील और छोटे निर्यातक इस समय दबाव में हैं।
सस्ता तेल, लेकिन मुनाफा किसे?
रूस से आयातित सस्ते तेल का लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुँचा। पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में कोई राहत नहीं दी गई, बल्कि मुनाफा केवल निजी रिफाइनरियों को मिला।
रिपोर्ट्स के अनुसार, केवल रिलायंस इंडस्ट्रीज ने ही 2022 से जून 2025 के बीच रूसी तेल खरीद-बिक्री से करीब 16 अरब डॉलर (₹1.40 लाख करोड़) का अतिरिक्त लाभ कमाया।
देश की सबसे बड़ी सात रिफाइनरियों में से रिलायंस और रूस-समर्थित नायारा एनर्जी मिलकर रूस से आने वाले तेल का लगभग 60% आयात करती हैं।

बड़ा सवाल: घाटा कौन भरे?
किसानों और निर्यातकों को अमेरिकी शुल्क की मार क्यों झेलनी चाहिए, जबकि मुनाफा रिफाइनरियों ने कमाया? विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को इन कंपनियों पर अतिरिक्त टैक्स या सरचार्ज लगाकर यह घाटा पूरा करना चाहिए।
नीति पर सवाल
लाल बहादुर शास्त्री ने कठिन समय में देशवासियों से “एक समय उपवास” की अपील की थी। आज ज़रूरत है कि India Inc भी ‘केयर एंड शेयर’ की जिम्मेदारी निभाए। लेकिन मौजूदा परिदृश्य यह दिखाता है कि कॉरपोरेट क्षेत्र सामाजिक दायित्व से अधिक अपने लाभ पर केंद्रित है।
भारत की व्यापार नीतियाँ केवल मुनाफे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि किसानों और छोटे निर्यातकों की आजीविका की भी रक्षा करनी चाहिए। निजी रिफाइनरियों के तेल मुनाफे का हिस्सा यदि इस घाटे की भरपाई में नहीं लगाया गया, तो यह असमान नीति किसानों और छोटे उद्योगों को तोड़ सकती है।



