रायपुर:छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है — विधायकों द्वारा सोशल मीडिया पर रील्स (Reels) बनाने और शेयर करने की होड़। कोई पारंपरिक वेशभूषा में अभिनय कर रहा है, तो कोई पॉपुलर गानों पर लिप-सिंक करता नजर आ रहा है। लेकिन इस ट्रेंड ने जनता के बीच गंभीर बहस छेड़ दी है — क्या जनसेवक का यह आचरण जिम्मेदार राजनीति के अनुरूप है?
रील का रस, जिम्मेदारी का क्षरण
विधानसभा के भीतर कानून बनाने वाले और बाहर विकास के वादे करने वाले जनप्रतिनिधि, अब रील बनाने में इतने व्यस्त हैं कि आम लोगों की समस्याओं से उनका ध्यान हटता दिख रहा है। सोशल मीडिया पर “फनी एक्ट” कर रहे विधायक आम जनता के बीच ‘टेसिया’ यानी मज़ाक का पात्र बनते जा रहे हैं।
छत्तीसगढ़िया संस्कृति में हास्यास्पद छवि अस्वीकार्य
छत्तीसगढ़ के लोग अपने प्रतिनिधियों से संवेदनशीलता, गरिमा और व्यवहार में गंभीरता की अपेक्षा रखते हैं। यदि कोई जनसेवक अपनी छवि को हल्का बना ले, तो छत्तीसगढ़िया जनमानस उसे स्वीकार नहीं करता।
संवेदनाओं से कटते नेता
रील्स की लोकप्रियता के चक्कर में कई विधायक छत्तीसगढ़ की संस्कृति, जनता की पीड़ा और जमीनी मुद्दों से कटते नजर आ रहे हैं। ऐसे में जनता का यह कहना स्वाभाविक है:
“अगर तुम हमारे दिल से उतर गए, तो बताओ किस घाट पर जाकर अपनी अगली रील बनाओगे?”
जनता की नजरें अब मोबाइल स्क्रीन से ज़्यादा दिल की स्क्रीन पर हैं
जनता अब सोशल मीडिया फॉलोअर्स से नहीं, बल्कि धरातल पर किए गए कामों से जनप्रतिनिधियों को आंक रही है। रील बनाना अपराध नहीं है, लेकिन अपने कर्तव्य और समाज के प्रति संवेदनशीलता भुला देना, जनता कभी माफ नहीं करती।



