रायपुर। शहर की पहले से ही जर्जर ट्रैफिक व्यवस्था को सुधारने की जगह अब उसे “दिखावटी सुधार” का चश्मा पहनाया जा रहा है। हाल ही में राजधानी रायपुर की सड़कों पर कलेक्टर साहब को ई-रिक्शा चलाते हुए देखा गया। देखने वालों ने पहले तो सोचा कोई नया प्रचार वीडियो शूट हो रहा है, लेकिन बाद में समझ आया कि यह ‘TRP और चुनावी जनसंपर्क’ का हिस्सा है।
जहाँ एक ओर सड़कें गड्ढों से भरी हैं, ट्रैफिक सिग्नल अक्सर खराब रहते हैं, और गलियों में अतिक्रमण का बोलबाला है — वहाँ कलेक्टर की ये सवारी किसी इवेंट प्रमोशन से कम नहीं लगी। लगता है, सरकार अब जमीनी सुधार नहीं, सोशल मीडिया पर लाइक और शेयर गिन रही है।
हैरानी की बात यह है कि जब ट्रैफिक नियमों में बड़े-बड़े बदलाव हुए, तब प्रशासन की चुप्पी गूंगी बीन जैसी थी। लेकिन अब चुनावी मौसम में जागरूकता की लहर इस तरह चल रही है जैसे कि पिछले पाँच सालों में सब कुछ ठीक था — और अब बस जनता को समझाने की जरूरत है कि ‘हम कितने एक्टिव हैं’।
छत्तीसगढ़ की एक EV निर्माता कंपनी की मदद से EV ट्रैफिक पेट्रोलिंग वाहन तो तैयार कर लिया गया है, जिसमें लगे हैं चमचमाते स्लोगन और पीए सिस्टम। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ ई-रिक्शा चलाकर, स्लोगन चिपकाकर और माइक पर बोलकर जमीनी हकीकत बदली जा सकती है?
जब शहर की गलियों में दम घुटता है, जब जाम में एंबुलेंस तक फँस जाती है, तब PR इवेंट से ज्यादा एक ठोस योजना की ज़रूरत होती है। लेकिन सरकार शायद मानती है कि अगर कलेक्टर खुद ई-रिक्शा चला लें, तो जनता सड़कों की दुर्दशा भूल जाएगी।



