छत्तीसगढ़ विधानसभा में निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए न्यूनतम भूमि की अनिवार्यता समाप्त किए जाने के प्रस्ताव का स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) ने कड़ा विरोध किया है। संगठन ने राज्य सरकार पर शिक्षा माफियाओं के दबाव में काम करने का आरोप लगाते हुए इस फैसले को उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा हमला बताया है।
SFI के जिलाध्यक्ष गर्व गभने, जिलासचिव हर्ष संघाणी और उपाध्यक्ष अल्पिका कन्नौजे ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि राज्य सरकार शिक्षा माफियाओं और दलालों के संरक्षण में काम कर रही है। उनका आरोप है कि प्रदेश के कई निजी विश्वविद्यालयों में फर्जी डिग्रियां बांटी जा रही हैं, लेकिन शिकायतों के बावजूद न तो उच्च शिक्षा विभाग, न ही निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग कोई ठोस कार्रवाई कर रहा है।
संगठन का कहना है कि विधानसभा में पारित प्रस्ताव के बाद अब छत्तीसगढ़ में बिना न्यूनतम भूमि के भी निजी विश्वविद्यालय स्थापित किए जा सकेंगे। SFI ने इसे देश में पहली ऐसी व्यवस्था बताया, जहां विश्वविद्यालय खोलने के लिए भूमि की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है। संगठन ने दावा किया कि नए स्कूलों और महाविद्यालयों के लिए भूमि का प्रावधान अब भी लागू है, जबकि विश्वविद्यालयों के लिए इसे खत्म कर दिया गया है।
SFI ने UGC के 2023 के संबद्धता नियमों का हवाला देते हुए कहा कि नए महाविद्यालयों के लिए महानगरों में कम से कम 2 एकड़ और अन्य क्षेत्रों में 5 एकड़ भूमि आवश्यक मानी गई है। वहीं विभिन्न राज्यों में निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए 5 से 100 एकड़ तक भूमि का प्रावधान है, जबकि छत्तीसगढ़ में इसे शून्य कर दिया गया है।
संगठन ने यह भी कहा कि वर्ष 2003 में भाजपा ने तत्कालीन अजीत जोगी सरकार के समय स्थापित निजी विश्वविद्यालयों को “दो कमरे की यूनिवर्सिटी” कहकर विरोध किया था, लेकिन अब वही सरकार बिना भूमि के विश्वविद्यालय खोलने का रास्ता साफ कर रही है।
SFI ने राज्य सरकार से इस प्रस्ताव को तत्काल वापस लेने, निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग में कथित भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।





