जगदलपुर।छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार पर अब राज्य की ऐतिहासिक और आदिवासी पहचान को बदलने का आरोप लग रहा है। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की सदियों पुरानी परंपरा ‘मुरिया दरबार’ को कार्यक्रम विवरणिका में ‘आम दरबार’ लिखे जाने के बाद आदिवासी समाज और विपक्ष ने सरकार पर सांस्कृतिक धरोहरों के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप मढ़ा है।
मुरिया दरबार केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बस्तर की आदिवासी लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक है। इसमें मांझी, चालकी और ग्रामीण प्रतिनिधि अपनी समस्याएं प्रशासन के सामने रखते हैं। इसे ‘आदिम जन संसद’ भी कहा जाता है और यह बस्तर दशहरा के समापन की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में से एक है।
आदिवासी समाज का कहना है कि ‘मुरिया दरबार’ नाम में बस्तर की सदियों पुरानी संस्कृति, स्वशासन और जन-सुनवाई की परंपरा समाई हुई है। इसे ‘आम दरबार’ कहना इस विशेष परंपरा की पहचान मिटाने जैसा है। समाज के प्रतिनिधियों ने इसका विरोध करते हुए कलेक्ट्रेट में शिकायत भी दर्ज कराई है और पुराना नाम तुरंत बहाल करने की मांग की है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 23 अक्तूबर को बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में शामिल होने जा रही हैं। ऐसे में बस्तर की पहचान बदला जाना सरकार पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
कांग्रेस ने इस मुद्दे पर भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि सरकार छत्तीसगढ़ की स्थानीय भाषा, संस्कृति और आदिवासी अस्मिता को लगातार बदलने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि बस्तर की 150 साल पुरानी मुरिया दरबार परंपरा को मिटाने की साजिश बर्दाश्त नहीं होगी। उनका आरोप है कि सरकार आदिवासी पहचान को नजरअंदाज कर रही है।
विपक्ष का कहना है कि जब सरकार को नाम बदलने में इतनी दिलचस्पी है, तो उसे बस्तर के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और नक्सल प्रभावित इलाकों की समस्याओं पर भी उतनी ही चिंता दिखानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को संस्कृति के नाम पर सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि उनकी पहचान और अधिकारों का सम्मान चाहिए।





