छत्तीसगढ़ के ‘शिमला’ कहे जाने वाले मैनपाट की वादियों में इन दिनों शांति नहीं, बल्कि एक गहरा डर और आक्रोश फैला है। मामला 135 हेक्टेयर में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन का है। लेकिन इस बार मामला केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि भाजपा के ‘यू-टर्न’ ने इसे एक बड़ा सियासी मुद्दा बना दिया है।
सत्ता बदलते ही बदले स्टैंड: विपक्ष में ‘आंदोलन’, सरकार में ‘मंजूरी’?
स्थानीय राजनीति में चर्चा गर्म है कि पिछले कुछ वर्षों में जब भाजपा विपक्ष में थी, तब उसके कई दिग्गज नेताओं ने मैनपाट के जंगलों को बचाने के लिए हुंकार भरी थी। उस समय खनन के विरोध को आदिवासियों के हक की लड़ाई बताया गया था। लेकिन अब प्रदेश में भाजपा की सरकार बनते ही मां कुदरगढ़ी स्टील प्राइवेट लिमिटेड के लिए रास्ते साफ किए जा रहे हैं, जिसे लेकर ग्रामीण खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
क्या दांव पर लगा है?
121 हेक्टेयर घना जंगल साफ़ होगा: प्रस्तावित 135 हेक्टेयर की खदान में से 121 हेक्टेयर केवल सघन वन क्षेत्र है।
हाथी कॉरिडोर पर संकट: यह इलाका 40 किलोमीटर लंबे हाथी कॉरिडोर का हिस्सा है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि रास्ता रुकने से हाथियों का दल सीधे रिहायशी बस्तियों में घुसेगा।
मांझी समुदाय की आजीविका: पास ही स्थित मांझी जनजाति की बस्ती का अस्तित्व पूरी तरह इस जंगल पर टिका है। ग्रामीणों का कहना है कि खदान शुरू हुई तो उनके पास पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।
पर्यटन को ग्रहण: धूल, ब्लास्टिंग के धमाके और भारी ट्रकों की आवाजाही मैनपाट की खूबसूरती को निगल जाएगी, जिससे स्थानीय होम-स्टे और पर्यटन कारोबार चौपट होने की कगार पर है।
ग्राम सभा को दरकिनार करने का आरोप
कंदराजा के सरपंच फुलसाय राम का दावा है कि ग्राम सभा ने इसके लिए कोई सहमति नहीं दी है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने जनसुनवाई की खानापूर्ति की और स्थानीय लोगों की आपत्तियों को फाइलों में दबा दिया गया
“यह सिर्फ पर्यावरण नहीं, विश्वास का मामला है”



