नई दिल्ली। लोकसभा में बुधवार को चुनाव सुधारों पर चर्चा उस वक्त सियासी टकराव में बदल गई, जब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखे जाने पर कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने आ गईं। सवाल चुनाव आयोग की स्वतंत्रता का था, और जवाब सियासी आरोप-प्रत्यारोप में बदल गया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के.सी. वेणुगोपाल ने सरकार को घेरते हुए पूछा कि आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाए गए चयन फॉर्मूले से पीछे हटते हुए CJI को समिति से हटा दिया गया। उन्होंने कहा कि जब तक इस विषय पर समग्र कानून नहीं बनता, तब तक प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और CJI की समिति को ही अपनाने का निर्देश दिया गया था। फिर अंतिम कानून में इस व्यवस्था को क्यों बदला गया?
वेणुगोपाल ने इस फैसले को चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्रता से जोड़ते हुए सरकार से स्पष्ट जवाब की मांग की।
इसके जवाब में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर जोरदार पलटवार किया। उन्होंने कहा कि जब देश की जनता प्रधानमंत्री पर सबसे बड़े राष्ट्रीय फैसलों का भरोसा जताती है, तो चुनाव आयुक्तों के चयन पर सवाल उठाना अनुचित है।
उन्होंने यह भी साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था एक अस्थायी समाधान थी, अंतिम नहीं। संसद ने विचार-विमर्श के बाद कानून बनाया है और यह पूरी तरह संवैधानिक है।
रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगाया कि कांग्रेस इस मुद्दे को जानबूझकर राजनीतिक रंग दे रही है, जबकि सरकार का उद्देश्य व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना है।
गौरतलब है कि संसद पहले ही उस कानून को मंजूरी दे चुकी है, जिसके तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होंगे। हालांकि, CJI को बाहर रखे जाने को लेकर विपक्ष का विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा।
अब सवाल सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि भरोसे का है—क्या यह बदलाव सुधार है या लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर चोट? यही बहस संसद के बाहर भी तेज होती दिख रही है।



