लेह, लद्दाख: भारत की बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ने लद्दाख में 35 गीगावॉट क्षमता वाला विशाल सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट प्रस्तावित किया है। यह योजना भारत की सबसे बड़ी ग्रीन एनर्जी परियोजना मानी जा रही है। सरकार का दावा है कि इस नेटवर्क से अकेले दिल्ली जैसे प्रदेश की दैनिक बिजली की ज़रूरत पूरी हो सकती है और पूरे उत्तर भारत को भी बिजली मिलेगी। इसके अलावा, इससे क्षेत्र में निवेश, रोज़गार और बुनियादी ढांचे के नए अवसर पैदा होंगे।
हालाँकि, इस महत्वाकांक्षी योजना के खिलाफ पर्यावरणविद और शिक्षाविद सोनम वांगचुक लगातार आवाज़ उठा रहे हैं। उनका कहना है कि पूर्वी लद्दाख के विशाल चराई क्षेत्र, जहाँ चांगपा समुदाय अपनी बकरियों को चराता है, इस प्रोजेक्ट से प्रभावित होंगे। ये ही चरागाह दुनिया की बेहतरीन पश्मीना ऊन उत्पादन की रीढ़ हैं। वांगचुक का तर्क है कि अगर बड़े पैमाने पर सोलर पैनल और बुनियादी ढाँचे लगाए गए तो इससे भूमि का अधिग्रहण बढ़ेगा, पारिस्थितिकी तंत्र का विखंडन होगा और स्थानीय आजीविका पर अपरिवर्तनीय असर पड़ेगा।
विरोध बढ़ने पर केंद्र सरकार ने सख्ती दिखाई है। हाल ही में सोनम वांगचुक से जुड़े एक NGO का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया है। सरकार का आरोप है कि यह संगठन विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल कर रहा था और विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए “गलत सूचनाएँ” फैला रहा था। वांगचुक को कुछ समय के लिए हिरासत में भी लिया गया, जिससे विवाद और गहरा गया।
यह पूरा मामला लद्दाख को एक महत्वपूर्ण चौराहे पर खड़ा करता है। एक ओर उद्योग जगत और केंद्र सरकार इसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और ग्रीन एनर्जी क्रांति की दिशा में बड़ा कदम बता रहे हैं। दूसरी ओर स्थानीय समुदाय और पर्यावरण कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि विकास योजनाएँ इस क्षेत्र की संवेदनशीलता और पारिस्थितिकी को ध्यान में रखकर बनाई जाएँ।



