अगर आप आज देश का संसद सत्र नहीं देख रहे थे, तो यकीन मानिए आपने बहुत कुछ मिस कर दिया। बजट सत्र का छठा दिन ऐसा रहा, जिसमें संसद कम और हंगामा ज़्यादा दिखा। हालात ये रहे कि न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोल पाए और न ही नेता विपक्ष राहुल गांधी।
सुबह 11 बजे शुरू हुई लोकसभा महज़ चार मिनट में ही ठप हो गई। विपक्षी सांसद वेल में उतर आए, नारेबाज़ी शुरू हुई और स्पीकर ओम बिड़ला को कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। दिन भर में कुल चार बार लोकसभा की कार्यवाही रोकी गई, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड बन गया।
सदन के बाहर भी सियासी तापमान कम नहीं था। निलंबित सांसद प्रधानमंत्री मोदी का पोस्टर लेकर विरोध कर रहे थे। इसी दौरान राहुल गांधी फिर से रिटायर्ड जनरल मनोज नरवणे की अनपब्लिश्ड किताब ‘Four Stars of Destiny’ हाथ में लेकर संसद पहुंचे। राहुल गांधी ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री उनसे मिलते हैं तो वे यह किताब उन्हें ज़रूर भेंट करेंगे।
इसी बीच एक और विवाद खड़ा हो गया जब राहुल गांधी ने केंद्रीय राज्यमंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को “हेलो माय ट्रेटर फ्रेंड” कह दिया। बात इतनी बढ़ी कि संसद परिसर में ही तीखी बहस शुरू हो गई।
लोकसभा में असली बवाल तब मचा जब भाजपा सांसद निशिकांत दुबे किताबों के पुलिंदे के साथ खड़े हुए। उन्होंने नेहरू, इंदिरा गांधी और कांग्रेस परिवार से जुड़ी किताबों का हवाला देते हुए उनके चरित्र और फैसलों पर सवाल खड़े किए। इसके बाद सदन में कागज़ फाड़े गए, हंगामा तेज हुआ और लोकसभा को शाम 5 बजे तक के लिए स्थगित करना पड़ा।
कांग्रेस सांसदों ने इस बयान को आपत्तिजनक बताते हुए स्पीकर ओम बिड़ला के केबिन तक पहुंचकर विरोध दर्ज कराया। शाम को प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन प्रस्तावित था, लेकिन हंगामे के चलते वह भी नहीं हो सका। अंततः लोकसभा की कार्यवाही अगले दिन सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई।
उधर राज्यसभा में तस्वीर थोड़ी अलग रही। नेता सदन जेपी नड्डा ने लगभग 50 मिनट तक सरकार की उपलब्धियां गिनाईं और भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर जानकारी दी। वहीं नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार की विदेश नीति, बेरोज़गारी और खाली सरकारी पदों पर तीखे सवाल उठाए।
राज्यसभा में आरजेडी सांसद मनोज झा ने कविता के जरिए देश के सामाजिक माहौल पर चिंता जताई, तो आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने दूध, सब्ज़ी और खाद्य पदार्थों में मिलावट को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े रखे। कमल हासन ने SIR को “बीमारी” बताते हुए इसे लोकतंत्र के लिए ख़तरा बताया।
कुल मिलाकर संसद का दिन बहस से ज़्यादा बवाल, संवाद से ज़्यादा शोर और मुद्दों से ज़्यादा टकराव में निकल गया। प्रदूषण, महंगाई, बेरोज़गारी जैसे असली मुद्दे आज भी शोर में दबे रह गए।



