भोपाल में आयोजित मॉक पार्लियामेंट के मंच से एक छात्रा ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को मुखर होकर संबोधित किया। उनका कहना था कि सरकार अक्सर “विकसित भारत” और “आपातकाल” जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देती है, लेकिन यौन-उत्पीड़न जैसे संवेदनशील और ज़रूरी विषयों पर बहस नहीं होती। साथ ही, उन्होंने दोषियों को कानूनी रूप से सजा न मिलने की चिंता जाहिर की ।
समस्या का स्वरूप:
1. विकास की ‘आवाज’ पर बहस, अपराध पर नहीं
छात्रा ने बताया कि भले ही समाज में कई संवेदनशील मामले उठते रहे—पर जब तक इन्हें सार्वजनिक चर्चा मिलती नहीं, तब तक समाधान की राह नहीं बनती। सरकार का फोकस बड़े मुद्दों पर होने के कारण, छोटे लेकिन गंभीर अपराधों पर ध्यान कम जाता है ।
2. दोषियों को सजा न मिलना
उन्होंने यह सवाल उठाया कि यौन-उत्पीड़न के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, लेकिन आरोपी या दोषी अभी तक दंड से बचे क्यों हैं? यह एक वैधानिक और नैतिक चक्रवात बन रहा है।
सामाजिक एवं संवैधानिक महत्त्व:
इस बहस की महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यौन-उत्पीड़न न सिर्फ व्यक्तिगत पीड़ा का विषय है, बल्कि यह संविधान में निहित “समानता” और “सम्मान की रक्षा” जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इसके समाधान के लिए अदालत, पुलिस और सामाजिक संस्थाओं के बीच समन्वित प्रयास जरूरी है।
पारदर्शी जांच व दंडात्मक कार्रवाई
यौन-शोषण और उत्पीड़न के मुद्दों की सुनवाई तेज़ ट्रिब्यूनल या विशेष अदालतों में होनी चाहिए, ताकि दोषियों को शीघ्र और उचित सजा मिल सके।
शिक्षा व जागरूकता कार्यक्रम
स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक संस्थानों में नियमित रूप से “#MeToo” जागरूकता और कानूनी उपायों की जानकारी दी जाए। इससे पीड़ितों को आत्मविश्वास मिलेगा और अपराधियों को कानूनी चेतावनी मिलेगी।
सरकारी मंच पर बहस
सरकार द्वारा हाउस में, मंत्रिपरिषद या CM की बैठकों में यौन-उत्पीड़न के मामलों को नियमित रूप से शामिल करने की आवश्यकता है—बिना किसी राजनीतिक बाधा या सफ़ेद घटना के जुड़े।



