रायपुर।छत्तीसगढ़ की IPS अधिकारी अंकिता शर्मा एक बार फिर अपने पहनावे को लेकर चर्चा में हैं। दशहरा पर्व के दौरान साड़ी पहनकर ड्यूटी करने और शस्त्र पूजन से जुड़ी तस्वीरों को लेकर उठे सवालों ने एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि विवाद वास्तव में किसी नियम के पालन से जुड़ा है या फिर एक महिला अधिकारी की सांस्कृतिक पहचान को लेकर अनावश्यक आपत्ति की जा रही है?
सरकारी स्कूल से IPS तक का सफर
अंकिता शर्मा ने छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूल में पढ़ाई कर अपनी मेहनत, प्रतिभा और संघर्ष के दम पर IPS अधिकारी बनने का मुकाम हासिल किया। उनकी पहचान केवल एक पुलिस अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी महिला अधिकारी के रूप में भी बनी है, जो आम जनता के बीच सहजता से संवाद करती हैं।
विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के साथ उनका आत्मीय व्यवहार उन्हें जनता के करीब लाता है। स्थानीय लोगों के बीच सहजता से घुल-मिल जाना और अपनी जड़ों से जुड़ाव बनाए रखना उनकी सार्वजनिक छवि का अहम हिस्सा है।
ऐसे में साड़ी पहनकर ड्यूटी करने की तस्वीरों पर सवाल उठना कई लोगों को खटक रहा है। उनका तर्क है कि किसी महिला अधिकारी की वर्दी के भीतर उसकी सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक पहनावे के प्रति पसंद भी सम्मान की अधिकारी होनी चाहिए।
दशहरा, शस्त्र पूजन और हर्ष फायरिंग पर बहस
दशहरा पर्व पर शस्त्र पूजन और उससे जुड़ी तस्वीरों को लेकर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। समर्थकों का कहना है कि किसी एक तस्वीर को आधार बनाकर विवाद खड़ा करने के बजाय पूरे मामले को तथ्यों और नियमों के आधार पर देखा जाना चाहिए।
हालांकि, हर्ष फायरिंग को केवल परंपरा के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। यदि किसी घटना में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यही कसौटी प्रत्येक अधिकारी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
नियमों का सवाल है तो आधार भी सार्वजनिक हो
यदि IPS अंकिता शर्मा को किसी नियम के उल्लंघन के कारण नोटिस दिया गया है, तो संबंधित नियम, नोटिस का आधार और आधिकारिक पक्ष सामने आना चाहिए। बिना तथ्यों की पुष्टि किए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
लेकिन यदि विवाद का केंद्र केवल उनका पारंपरिक पहनावा है, तो यह निश्चित रूप से विचारणीय विषय है। भारतीय संस्कृति में साड़ी का विशेष स्थान है। ऐसे में किसी महिला अधिकारी की कार्यक्षमता और पेशेवर योग्यता का मूल्यांकन उसके पहनावे के बजाय उसके काम, आचरण और नियमों के पालन के आधार पर होना चाहिए।
बड़े मामलों में जवाबदेही पर भी उठें सवाल
छत्तीसगढ़ में महादेव ऐप प्रकरण और कथित भ्रष्टाचार से जुड़े विभिन्न मामलों में अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठे हैं। ऐसे मामलों में जांच की स्थिति, आरोपों की प्रकृति और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध हुई कार्रवाई को लेकर पारदर्शिता जरूरी है।
हालांकि, अलग-अलग मामलों में आरोपों और कानूनी परिस्थितियों की प्रकृति भिन्न हो सकती है, इसलिए किसी अधिकारी को केवल आरोपों के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता। फिर भी जनता यह जानना चाहती है कि गंभीर मामलों में जांच कितनी आगे बढ़ी, जवाबदेही किस स्तर पर तय हुई और कार्रवाई के मानदंड क्या रहे।
सवाल यही है कि क्या प्रशासनिक जवाबदेही की कसौटी सभी अधिकारियों के लिए समान है? कानून का पालन हर किसी के लिए अनिवार्य है और किसी भी अधिकारी को उसके पद के कारण सवालों से ऊपर नहीं माना जा सकता।
छत्तीसगढ़ की बेटी के सम्मान का सवाल
अंकिता शर्मा के समर्थकों का मानना है कि उनकी उपलब्धियों और जनता के साथ उनके जुड़ाव को उनके पहनावे के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। किसी भी अधिकारी की आलोचना तथ्यों, नियमों और कार्यप्रणाली के आधार पर होनी चाहिए, न कि उसकी सांस्कृतिक पहचान को निशाना बनाकर।
छत्तीसगढ़ की बेटियां अपनी मेहनत और प्रतिभा से नई पहचान बना रही हैं। ऐसी उपलब्धियों का सम्मान करते हुए यह भी जरूरी है कि अधिकारियों से जुड़े सवालों पर तथ्यपरक चर्चा हो और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
साड़ी किसी अधिकारी की क्षमता कम नहीं करती और वर्दी किसी को सवालों से ऊपर नहीं उठाती। निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही ही किसी भी अधिकारी के मूल्यांकन की असली कसौटी होनी चाहिए।





