28 मार्च से भारत में एक बार फिर क्रिकेट का महाकुंभ शुरू होने जा रहा है इंडियन प्रीमियर लीग। स्टेडियम में गूंजते नारों, टीवी स्क्रीन पर चमकते सितारों और हर चौके-छक्के के साथ देश का माहौल पूरी तरह क्रिकेटमय हो जाएगा।
लेकिन इस बार सिर्फ बल्ले और गेंद की ही बाज़ी नहीं लगेगी, देश का युवा वर्ग भी अपनी किस्मत दांव पर लगाने को तैयार है।
मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियां तेज़ी से चलेंगी, और Dream11 और RummyCircle जैसे ऐप्स पर ‘टीम बनाकर’ करोड़पति बनने के सपने बुने जाएंगे। हर मैच के साथ उम्मीदें बढ़ेंगी, हर हार के बाद “अगली बार पक्का जीतेंगे” का भरोसा भी।
करीब डेढ़ महीने तक ऐसा लगेगा जैसे देश के असली मुद्दे महंगाई, बेरोजगारी और भुखमरी थोड़ी देर के लिए ‘डगआउट’ में बैठ गए हों। मैदान में सिर्फ रोमांच है, और मोबाइल में ‘लक’ आज़माने का खेल।
विज्ञापनों में मुस्कुराते चेहरे, बड़े-बड़े सितारे और जीत की कहानियां यह यकीन दिलाती हैं कि “हर कोई जीत सकता है।”
लेकिन हकीकत अक्सर इससे अलग होती है जहां कुछ लोग ही जीतते हैं, और बाकी सिर्फ कोशिश करते रह जाते हैं।
रोजगार के अवसर भले सीमित हों, लेकिन ऑनलाइन ‘सट्टे’ का मैदान हर किसी के लिए खुला है। यहां डिग्री नहीं, ‘फॉर्म’ और ‘लक’ काम आता है। क्रिकेट चलता रहेगा, दर्शक झूमते रहेंगे, ऐप्स चमकते रहेंगे…
लेकिन सवाल वही रहेगा
इस खेल में असली विजेता कौन है? खिलाड़ी, कंपनियां या फिर सिस्टम?



